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Friday, 13 May 2016

मिटटी कला का इतिहास

मिटटी कला का इतिहास

माना जाता है कि ”सरामिक नाम ग्रीक शब्द ”केरामिक से लिया गया है, जिसे मिटटी के पात्र बनाने की कला कहते हैं। आज कि उन सभी प्रयोग में आने वाली कृतियों को सिरामिक कहते हैं जिन्हें आग द्वारा पकाया जाता है। जर्मनी और फ्रांसीसी भाषा में ऐसी कृतियों को ”केरामिक और ”सिरामिक कहा जाता है।

पात्र बनाने की कला सबसे पुरानी है। इस कला की क्रमवार प्रगति को जानना बहुत मुशिकल है। आगे के पन्नों में एशिया और यूरोप में अनेक प्रकार के बने मिटटी के बने पात्रों की प्रगति का संक्षेप इतिहास वर्णन करने की कोशिश की है।

शायद सबसे पहले इन कृतियों को इस्तेमाल करने वाले लोग प्राचीन मिश्र के निवासी थी। टेराकोटा के कलश भरे हुए लोगों के सामान के लिए इस्तेमाल में आते थे। ये कल मेमहाइट अवधि 5000-3000वी0सी0 के मकबरों और कब्रों में पाये गये और कुछ र्इंटें नील घाटी के नीचे पार्इ गर्इ जिसे इस हजार वर्ष पूर्व बनी बताया जाता है।

कुछ समय बाद इन लोगों ने मिटटी की चमकीली कृतियों की कला को खोल निकाला जिन्हें आज भी स्तंभों और मंदिरों में देखा जा सकता है। अच्छे पात्र व कृतियाँ ज्यादातर आसमानी नीले और पीले हरे रंग की पतली चमक से ढके होते हैं। कभी-कभी मिटटी का अपना रंग भी होगा है परन्तु आमतौर पर यह सफेद ही होता है।
असीरीयन और बेबीलोनियन प्राचीनकाल से रंगीन टेराकोटा इस्तेमाल करते थे।

हीरोडोटस कहते हैं कि मध्यकाल की इक्वराना की दीवारें सात रंगों से रंगी थी। पुरातन असीरीयन में खोरसावाद की खुदार्इ में एक र्इंट द्वारा बनी दीवार को 21 फुट लम्बी और 5 फुट ऊँची थी, पर मनुष्य जानवर और पेड़ों की आकृतियाँ पार्इ गर्इ। नीनवह और बेवीलोन में मिटटी से बने पात्रों के नमूने जिन्हें500 वी0सी0 में बने माना जाता है, आज कल पेरिस के लोवरे संग्रहालय में पाये जाते हैं।

विश्वास किया जाता है कि परमिशनों फारसी ने इस कला को असीरियनों से सीखा और इस कला को उच्च श्रेणी की प्रवीणता को पाने में सफलता पार्इ। पुरातन परशियन पात्रों को बनाने के लिए उच्च ठोस पदार्थ का प्रयोग होता था और पारदर्शिक्षार अलकालीन द्वारा उमदा चमक दी जाती थी। पात्रों को हल्के पीले और नीे रंग की चमक से सजाया जाता था।

भारत में अनेक प्रकार की मिटटी से बनी कतियाँ बहुत प्राचीनकाल से इस्तेमाल होती आर्इ हैं। हाल में हुर्इ खुदार्इ से पता चलता है कि यह कला 4000 वर्ष पहले भी उन्नति पर थी। इसमें कोर्इ सन्देह नहीं कि सिघु घाटी में हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खुदार्इ में मिली वस्तुएँ सुमेरियन कला कृतियों में बहुत मेल खाती हैं जिन्हें र्इसा से तीसरी या चौथी सदी पहले की बनी आंका गया है।

यह मिटटी के पात्र किसके समय से मिलते-जुलते हैं और हड़प्पा और मोहन जोदड़ों के समय की मोहर हम्मूरसली समय के मंदिर के मलबे में पायी गर्इ।

पोटरी का वर्णन मंत्रों में मिलता है क्योंकि छठीं व नवमी सदी बीसी, में बने मनु के कानून ज्यादा स्पष्ट है। मिटटी के बर्तन भारत के प्राय: सभी भागों में प्रयोग होते हैं और कुम्हार हिन्दू समाज के महानकर्मी जाति के हैं।

अधिकतर पूर्व इतिहासिक शिला कृतियों की सतह को लाल, भूरी यााले रंग की चमक देते आये हैं और आज की साधारण कला कृतियों की बनावट और कारीगरी से कहीं बढ़कर है…………

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