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Friday, 22 April 2016

अनोखी घटना…..

अनोखी घटना…..

आपका व्यवहार ही आप को सम्मान दिलाता है…..

एक बर्फ बनाने की विशाल फैक्ट्री थी! हजारों टन बर्फ हमेशा बनता था ! सैकड़ों मजदूर व अन्य कर्मचारी एवं अधिकारी वहां कार्य करते थे ! उन्ही में से
था एक कर्मचारी अखिलेश ! अखिलेश उस फैक्ट्री में पिछले बीस वर्षों से कार्य कर रहा था ! उसके मृदु व्यहार, ईमानदारी,एवं काम के प्रति समर्पित भावना के कारण वो उन्नति करते करते उच्च सुपरवाइजर के पद पर पहुँच गया था ! उसको फैक्ट्री के हर काम की जानकारी थी ! जब भी कोई मुश्किल घडी होती सब, यहाँ तक की फैक्ट्री के मालिक भी उसी को याद करते थे और वह उस मुश्किल पलों को चुटकियों में हल कर देता था ! इसी लिए फैक्ट्री में सभी लोग , कर्मचारी, व् अन्य अधिकारी उसका बहुत मान करते थे !

इन सब के अलावा उसकी एक छोटी सी अच्छी आदत और थी वह जब भी फैक्ट्री में प्रवेश करता फैक्ट्री के गेट पर तैनात सुरक्षा गार्ड से ले कर सभी अधिनिस्त कर्मचारियों से मुस्कुरा कर बात करता उनकी कुशलक्षेम पूछता और फिर अपने कक्ष में जा कर अपने काम में लग जाता !और यही सब वह जब फैक्ट्री का समय समाप्त होने पर घर पर जाते समय करता था ! एक दिन फैक्ट्री के मालिक ने अखिलेश को बुला कर कहा ” अखिलेश एक मल्टी नेशनल कम्पनी जो की आइसक्रीम बनती है ने हमें एक बहुत बड़ा आर्डर दिया है और हमें इस आर्डर को हर हाल में नीयत तिथि तक पूरा करना है ताकि कंपनी की साख और लाभ दोनों में बढ़ोतरी हो तथा और नई मल्टी नेशनल कंपनियां हमारी कंपनी से जुड़ सके ! इस काम को पूरा करने के लिए तुम कुछ भी कर सकते हो चाहे कर्मचारियों को ओवरटाइम दो बोनस दो या और नई भर्ती करो पर आर्डर समय पर पूरा कर पार्टी को भिजवाओ “…….

अखिलेश ने कहा ठीक है में इस आर्डर को समय पर पूरा कर दूंगा ! मालिक ने मुस्कुरा कर अखिलेश से कहा “मुझे तुमसे इसी उत्तर की आशा थी” अखिलेश ने सभी मजदूरों को एकत्रित किया और आर्डर मिलाने की बात कही और कहा “मित्रो हमें हर हाल में ये आर्डर पूरा करना है इसके लिए सभी कर्मचारियों को ओवरटाइम, बोनस सभी कुछ मिलेगा साथ ही ये कंपनी की साख का भी सवाल है “! एक तो कर्मचारियों का अखिलेश के प्रति सम्मान की भावना तथा दूसरी और ओवरटाइम व बोनस मिलाने की ख़ुशी ,सभी कर्मचरियों ने हां कर दी ! फैक्ट्री में दिन रात युद्धस्तर पर काम चालू हो गया !

अखिलेश स्वयं भी सभी कर्मचारियों का होसला बढ़ाता हुआ उनके कंधे से कन्धा मिला कर काम कर रहा था ! उन सभी की मेहनत रंग लाइ और समस्त कार्य नीयत तिथि से पूर्व ही समाप्त हो गया ! साडी की साडी बर्फ शीतलीकरण (कोल्ड स्टोरेज) कक्ष जो एक विशाल अत्याधुनिक तकनीक से बना हुआ तथा कम्प्यूटराइज्ड था , में पेक कर के जमा कर दी गई ! सभी कर्मचारी काम से थक गए थे इस लिए उस रोज काम बंद कर सभी कर्मचारियों की छुट्टी कर दी गई सभी कर्मचारी अपने अपने घर की तरफ प्रस्तान करने लगे !

अखिलेश ने सभी कार्य की जांच की और वह भी घर जाने की तैयारी करने लगा जाते जाते उसने सोचा चलो एक बार शीतलीकरण कक्ष की भी जाँच कर ली जाये की सारी की सारी बर्फ पैक्ड और सही है की नहीं ,यह सोच वो शीतलीकरण कक्ष को खोल कर उसमे प्रवेश कर गया ! उसने घूम फिर कर सब चेक किया और सभी कुछ सही पा कर वह जाने को वापस मुडा ! पर किसी तकनीकी खराबी के कारण शीतलीकरण कक्ष का दरवाजा स्वतः ही बंद हो गया ! दरवाजा ऑटोमेटिक था तथा बाहर से ही खुलता था इस लिए उसने दरवाजे को जोर जोर से थपथपाया पर सभी कर्मचारी जा चुके थे उसकी थपथपाहट का कोई असर नहीं हुआ उसने दरवाजा खोलने की बहुत कोशिश की पर सब कुछ बेकार रहा ! दरवाजा केवल बाहर से ही खुल सकता था…

अखिलेश घबरा गया उसने और जोर से दरवाजे को पीटा जोर से चिल्लाया पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई ! अखिलेश सोचने लगा की कुछ ही घंटों में शीतलीकरण कक्ष का तापक्रम शून्य डिग्री से भी कम हो जायेगा ऐसी दशा में मेरा खून का जमना निश्चित है ! उसे अपनी मोत नजदीक दिखाई देने लगी !उसने एक बार पुनः दरवाजा खोलने की कोशिश की पर सब कुछ व्यर्थ रहा !कक्ष का ताप धीरे धीरे कम होता जा रहा था ! अखिलेश का बदन अकड़ने लगा ! वो जोर जोर से अपने आप को गर्म रखने के लिए भाग दौड़ करने लगा ! पर कब तक आखिर थक कर एक स्थान पर बैठ गया !

ताप शुन्य डिग्री की तरफ बढ़ रहा था ! अखिलेश की चेतना शुन्य होने लगी ! उसने अपने आप को जाग्रत रखने की बहुत कोशिश की पर सब निष्फल रहा ! ताप के और कम होने पर उसका खून जमने के कगार पर आ गया ! और अखिलेश भावना शुन्य होने लगा ! मोत निश्चित जान वह अचेत हो कर वही ज़मीन पर गिर पड़ा ! कुछ ही समय पश्चात दरवाजा धीरे से खुला ! एक साया अंदर आया उसने अचेत अखिलेश को उठाया और शीतलीकरण कक्ष से बाहर ला कर लिटाया उसे गर्म कम्बल से ढंका और पास ही पड़ा फैक्ट्री के कबाड़ को एकत्रित कर उसमे आग जलाई ताकि अखिलेश को गर्मी मिल सके और उसका रक्तसंचार सुचारू हो सके !

गर्मी पाकर अखिलेश के शरीर में कुछ शक्ति आई उसका रक्तसंचार सही होने लगा ! आधे घंटे के बाद अखिलेश के शरीर में हरकत होने लगी उसका रक्तसंचार सही हुआ और उसने अपनी आँखे खोली ! उसने सामने गेट पर पहरा देने वाले सुरक्षा गार्ड शेखर को पाया ! उसने शेखर से पुछा मुझे बाहर किसने निकला और तुम तो में गेट पर रहते हो तुम्हारा तो फैक्ट्री के अंदर कोई कार्य भी नहीं फिर तुम यहाँ कैसे आये ? शेखर ने कहा “सर में एक मामूली सा सुरक्षा गार्ड हूँ ! फैक्ट्री में प्रवेश करने वाले प्रत्येक पर निगाहे रखना तथा सभी कर्नचारियों व अधिकारियो को सेल्यूट करना ये ही मेरी ड्यूटी है ! मेरे अभिवादन पर अधिकतर कोई ध्यान नहीं देता कभी कभी कोई मुस्कुरा कर अपनो गर्दन हिला देता है ! पर सर एक आप ही ऐसे इंसान है जो प्रतिदिन मेरे अभिवादन पर मुस्कुरा कर अभिवादन का उत्तर देते थे साथ ही मेरी कुशलक्षेम भी पूछते थे !

आज सुबह भी मेने आपको अभिवादन किया आपने मुस्कुरा कर मेरे अभिवादन का उत्तर दिया और मेरे हालचाल पूछे! मुझे मालूम था की इन दिनों फैक्ट्री में बहुत काम चल रहा है जो आज समाप्त हो जायेगा ! और काम समाप्त भी हो गया सभी लोग अपने अपने घर जाने लगे ! जब सब लोग दरवाजे से निकल गए तो मुझे आप की याद आई की रोज आप मेरे से बात कर के घर जाते थे पर आज दिखाई नहीं दिए ! मेने सोचा शायद अंदर काम में लगे होंगे ! पर सब के जाने के बाद भी बहुत देर तक आप बहार आते दिखी नहीं दिए तो मेरे दिल में कुछ शंकाएं उत्पन्न होने लगी !

क्यों की फैक्ट्री के जाने आने का यही एकमात्र रास्ता है इसी लिए में आपको ढूंढते हुए फैक्ट्री के अंदर आ गया ! मेने आपका कक्ष देखा मीटिंग हाल देखा बॉस का कक्ष देखा पर आप कही दिखाई नहीं दिए ! मेरा मन शंका से भर गया की आप कहाँ गए ? कोई निकलने का दूसर रास्ता भी नहीं है ! में वापस जाने लगा तो सोचा चलो शीतलीकरण कक्ष भी देख लू ! पर वो बंद था ! में वापस जाने को मुडा पर मेरे दिल ने कहा की एक बार इस शीतलीकरण कक्ष को खोल कर भी देखूं ! में आपात्कालीन चाबियाँ जो मेरे पास रहती है ,से कक्ष खोला तो आपको यहाँ बेहोश पाया !

अखिलेश एक टक शेखर के चहरे की और देखे जा रहा था उसने सपने में भी नहीं सोचा था की उसकी एक छोटी सी अच्छी आदत का प्रतिफल उसे इतना बड़ा मिलेगा ! उसकी आँखों में आंसू भर आये उसने उठ कर शेखर को गले लगा लिया !

अगर दोस्तों को इस कहानी में कुछ सार नजर आये तो कोशिश करे की इस ग्रुप के सभी सदस्य इस कहानी को पढ़ सके और एक अच्छी आदत चाहे वह छोटी सी ही क्यों ना हो अपने जीवन में उतार सकें……..” तमीज़ से बात करोगे इज्ज़त मुफ्त में मिलेगी”……

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लकडहारे की समझदारी…

लकडहारे की समझदारी…….

एक लकड़हारा दिन भर लकड़ियां काटता और उन्हें बाज़ार में बेच कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करता था ! इस प्रकार बहुत समय बीत गया ! एक दिन लकड़हारे सोचा, मेरी जिंदगी भी क्या जिंदगी है, रोजाना लकड़ियां काटना, उन्हें बाज़ार में बेचना,और अपना एवं अपने परिवार का पालन करना, बस ये ही मेरी जिंदगी बन कर रह गई है ! मेरे जीवन में आराम और आनंद मनाने का कोई अवसर ही नहीं आया! क्या मेरा जीवन इसी प्रकार बीत जायेगा? ये सोच कर उसने अपने मन में निश्चय किया कि में आज तिगुना काम कर के तिगुनी लकड़ियां काटूंगा और उन्हें बाज़ार में बेच कर तीन रोज आराम करूंगा!

ये सोच कर उसने मेहनत करने के लिए कमर कास ली! उसने लगातार मेहनत के साथ काम कर के तीन दिनों कि लकड़ियां काट ली! अधिक मेहनत करने के कारण वह बहुत थक गया और एक पेड़ के नीचे बैठ कर सुस्ताने लगा! उधर से एक साधू महात्मा गुजरे! उन्होंने लकड़हारे को पेड़ के नीचे हांपते और सुस्ताते देख कर पुछा” क्या बात है इतने थके 2 से क्यों लग रहे हो?”

लकड़हारे ने महात्मा को अपने मन कि सारी बात बताई कि किस प्रकार तिगुनी मेहनत कर तीन दिनों कि लकड़ियां काटी और उन्हें उन्हें बेच कर अब तीन दिनों तक आराम करूंगा और चक छान कर सोऊंगा!महात्मा ठहरे महात्मा बोले “तू कितना पागल है, अरे पल का पता नहीं कब मौत आ जाये और तू तीन दिनों कि सोच रहा है! और हँसने लगे!

लकड़हारा एक तो थका हुआ था,और ऊपर से महात्माजी का पर्वचन सुन कर ताव में आगया, उसने कहा “पागल में नहीं आप है. अरे अगर मौत आ गई तो मेहनत करी या ना करी सब बेकार है पर अगर में ज़िंदा रहा तो तीन दिनों तक आराम करने का अवसर तो मिलेगा ! ये कह कर उसने करवट बदल कर आँखें बंद कर ली और आराम करने लगा……महात्माजी मन ही मन सोचने लगे कि इतनी बुद्धि तो मेरे में भी नहीं है !और वहाँ से चले गये!

कहने का अर्थ यह है कि प्रत्येक कार्य जिन्दा रहने के लिये किया जाता है !मरने पर तो सब कुछ बेकार! अतः ये सोच कर ही कार्य करे कि जिंदगी रही तो इस कार्य का आनंद मनाएंगे !

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अनपढ़ जाट

अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा, पढ़ा जाट खुदा जैसा…….

अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा, पढ़ा जाट खुदा जैसा” यह घटना सन् 1270-1280 के बीच की है । दिल्ली में बादशाह बलबन का राज्य था । उसके दरबार में एक
अमीर दरबारी था ।जिसके तीन बेटे थे । उसके पास उन्नीस घोड़े भी थे । मरने से पहले वह वसीयत लिख गया था कि इन घोड़ों का आधा हिस्सा… बड़े बेटे को, चौथाई हिस्सा मंझले को और पांचवां हिस्सा सबसे छोटे बेटे को बांट दिया जाये । बेटे उन 19 घोड़ों का इस तरह बंटवारा कर ही नहीं पाये और बादशाह के दरबार में इस समस्या को सुलझाने के लिए अपील की ।

बादशाह ने अपने सब दरबारियों से सलाह ली पर उनमें से कोई भी इसे हल नहीं कर सका । उस समय प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो बादशाह का दरबारी कवि था । उसने जाटों की भाषा को समझाने के लिए एक पुस्तक भी बादशाह के कहने पर लिखी थी जिसका नाम “खलिक बारी” था । खुसरो ने कहा कि मैंने जाटों के इलाक़े में खूब घूम कर देखा है और पंचायती फैसले भी सुने हैं और सर्वखाप पंचायत का कोई पंच ही इसको हल कर सकता है ।नवाब के लोगों ने इन्कार किया कि यह फैसला तो हो ही नहीं सकता..!

परन्तु कवि अमीर खुसरो के कहने पर बादशाह बलबन ने सर्वखाप पंचायत में अपने एक खास आदमी को चिट्ठी देकर सौरम गांव (जिला मुजफ्फरनगर) भेजा (इसी गांव में शुरू से सर्वखाप पंचायत का मुख्यालय चला आ रहा है और आज भी मौजूद है) । चिट्ठी पाकर पंचायत ने प्रधान पंच चौधरी रामसहाय को दिल्ली भेजने का फैसला किया। चौधरी साहब अपने घोड़े पर सवार होकर बादशाह के दरबार में दिल्ली पहुंच गये और बादशाह ने अपने सारे दरबारी बाहर के मैदान में इकट्ठे कर लिये । वहीं पर 19 घोड़ों को भी लाइन में बंधवा दिया ।

चौधरी रामसहाय ने अपना परिचय देकर कहना शुरू किया – “शायद इतना तो आपको पता ही होगा कि हमारे यहां राजा और प्रजा का सम्बंध बाप-बेटे का होता है और प्रजा की सम्पत्ति पर राजा का भी हक होता है । इस नाते मैं जो अपना घोड़ा साथ लाया हूं, उस पर भी राजा का हक बनता है । इसलिये मैं यह अपना घोड़ा आपको भेंट करता हूं और इन 19 घोड़ों के साथ मिला देना चाहता हूं, इसके बाद मैं बंटवारे के बारे में अपना फैसला सुनाऊंगा ।”

बादशाह बलबन ने इसकी इजाजत दे दी और चौधरी साहब ने अपना घोड़ा उन 19 घोड़ों वाली कतार के आखिर में बांध दिया, इस तरह कुल बीस घोड़े हो गये । अब चौधरी ने उन घोड़ों का बंटवारा इस तरह कर दिया-

- आधा हिस्सा (20 ¸ 2 = 10) यानि दस घोड़े उस अमीर के बड़े बेटे को दे दिये ।

- चौथाई हिस्सा    (20 ¸ 4 = 5) यानि पांच घोडे मंझले बेटे को दे दिये ।

- पांचवां हिस्सा (20 ¸ 5 = 4) यानि चार घोडे छोटे बेटे को दे दिये ।

इस प्रकार उन्नीस (10 + 5 + 4 = 19) घोड़ों का बंटवारा हो गया । बीसवां घोड़ा चौधरी रामसहाय का ही था जो बच गया । बंटवारा करके चौधरी ने सबसे कहा – “मेरा अपना घोड़ा तो बच ही गया है, इजाजत हो तो इसको मैं ले जाऊं ?” बादशाह ने हां कह दी और चौधरी साहब का बहुत सम्मान और तारीफ की । चौधरी रामसहाय अपना घोड़ा लेकर अपने गांव सौरम की तरफ कूच करने ही वाले थे, तभी वहां पर मौजूद कई हजार दर्शक इस पंच के फैसले से गदगद होकर नाचने लगे और कवि अमीर खुसरो ने जोर से कहा - “अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा, पढ़ा जाट खुदा जैसा”। सारी भीड़ इसी पंक्ति को दोहराने लगी ।

तभी से यह कहावत हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उत्तरप्रदेश तंथा दूसरी जगहों पर फैल गई । यहां यह बताना भी जरूरी है कि 19 घोड़ों के बंटवारे के समय विदेशी यात्री और इतिहासकार इब्न-बतूत भी वहीं दिल्ली दरबार में मौजूद था । यह वृत्तांत सर्वखाप पंचायत के अभिलेखागार में मौजूद है ।

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दो शिक्षाप्रद कथायें…….

दो शिक्षाप्रद कथायें…….

एक दिन किसी कारण से स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण,एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया ।
वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा ।
उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं ।
फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं ।
जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है ?
पापा ने कहा-बेटा बोलो क्या पूछना चाहते हो ?
बेटा बोला- पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं , आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों ?
इसका जो उत्तर पापा ने दिया-उन दो पंक्तियाँ में मानों उसने ज़िन्दगी का सार समझा दिया ।
उत्तर था- ” बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है ।
यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं………..!!!!

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गुरु अग्निमित्र अपने शिष्य वासुकि को बहुत समझाते कि यह करो, यह मत करो आदि। पर शिष्य पर उनकी बातों का कोई असर नहीं होता था। वासुकि को जो अच्छा लगता, वही करता। जबकि मन को भाने वाले कामों से उसे अक्सर तकलीफ ही होती।

गुरु ने उसे समझाया, पर वासुकि ने कहा, मुझे कोई मार्ग नहीं सूझता। मैं हर बार उन चीजों के बारे में सोचता हूं, जिनके बारे में मना किया गया है। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे मन में उन चीजों को पाने की इच्छा होती रहती है, जो वर्जित हैं। आखिर मैं क्या करूं?

गुरु ने उसे समझाने की कोशिश की। यह भी कहा, गुरुजन जिन कामों के लिए मना करते हैं, उन्हें मत किया करो। लेकिन इस पर शिष्य ने कहा, यह तो आंख मूंदकर किसी की भी आज्ञा मान लेने जैसा होगा। साधना के मार्ग पर चल रहे व्यक्ति का लक्षण तो यह नहीं हो सकता कि जिस काम के लिए कोई मना करे, उसे न किया जाए।

बल्कि वह तो उसे तथ्यों की कसौटी पर कसता है। इस पर गुरु ने कहा, अच्छा, भला-बुरा तय करने का एक सूत्र मैं तुम्हें देता हूं। फिर वह शिष्य को पास ही गमले में लगे एक पौधे के पास ले गए। उसे देखने के लिए कहा और पूछा कि वह क्या है?

शिष्य के पास उत्तर नहीं था। गुरु ने कहा, यह मकोय (बेलाडोना) का विषैला पौधा है। यदि तुम इसकी पत्तियों को खा लो, तो तुम्हारी तुरंत मृत्यु हो जाएगी। लेकिन इसे देखने भर से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तुम्हारे मन में सत्पुरुषों द्वारा निंदित विचार और काम आते हैं, तो आने दो।

मन में आ रहे उन विचारों से तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। हानि तब तक नहीं होगी, जब तक तुम उन्हें व्यवहार में न उतार लो। इसलिए सुनो सबकी, पर करो वही, जिसे सत्पुरुषों ने प्रमाणित किया हो।

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बाजों का जोड़ा….

बाजों का जोड़ा….


बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे। राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।

जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे हैं । राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा,  “मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो ।” आदमी ने ऐसा ही किया।

इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था। ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा.  “क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”, राजा ने सवाल किया।  आदमी  ने जवाब दिया जी हुजूर , इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।

राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।  अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।

फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे , पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।

फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था। वह व्यक्ति एक किसान था।

अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा , ” मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया। “

“मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिस पर
बैठने का आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा”।

दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की काबिलियत को भूल जाते हैं। यदि आप भी सालों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही पोटेंशियल के मुताबिक नहीं है तो एक बार ज़रूर सोचिये कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हुए हैं…….

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पेट की गैस दूर करने के उपाय ::

पेट की गैस दूर करने के उपाय ::

पेट में हवा भरने को उदर वायु, अफारा आना, गैस भरना, गैस बनना, वायु इकट्ठी होना कहते है। उदर वायु एक ऐसी स्थिति है, जिसमें पेट में वायु एकत्रित होती है। आंतों और पेट दोनों में एक साथ वायु अपच अथवा कब्ज के कारण इकट्ठी होती है। वायु निगलने से जो वायु पेट में एकत्रित होती है, उसे 'स्ायविक उदर वायु' कहते हैं। स्वस्थ रहने के लिये भोजन में मसाले आवश्यक है। प्रायः हल्दी, धनिया, नमक, मिर्च इत्यादि मसालों के रूप में प्रयोग किये ही जाते हैं।

हींग भूनकर सेवन करने से वायु (वात), जीरा पित्त और गर्म मसाले कफ को ठीक करते हैं। रूखा भोजन गैस को बढ़ाता है। पेट में अधिक गैस रूखे भोजन के कारण ही बनती है। जिन व्यक्तियों को ज्यादा गैस बनती है, उन्हें अपने भोजन में चिकनाई, तेल, घी का प्रयोग कम करना चाहिए। रूखे भोजन में मसालेयुक्त सब्जियां, घी, दूध, दही, मीठा शामिल हों तो अच्छा है।

गैस दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाएं :-
पानी : गैस होने पर खाना खाने के बाद एक गिलास गर्म-गर्म पानी, जितना भी गर्म पीया जा सके, लगातार कुछ सप्ताह तक पीएं। ऐसा करने से गैस की बीमारी दूर होगी।

सौंफ : नींबू के रस में भीगी हुई सौंफ को भोजन के बाद खाने से पेट का भारीपन दूर होता है, गैस निकलती है, भूख लगती है तथा मल भी साफ होता है।

सेब : सेब का रस पाचन अंगों पर पतली तह चढ़ा देता है, जिससे वे संक्रमण तथा बदबू से बचे रहते हैं, गैस उत्पन्न होना रूक जाता है और मलाशय तथा निचली आंतों में दुर्गन्ध व संक्रमण नहीं होता।

हल्दी : पेट में गैस इकट्ठी होने से बहुत दर्द होता है। ऐसी स्थिति में पिसी हुई हल्दी और नमक पांच-पांच ग्राम गर्म पानी से लें। तुरन्त लाभ होगा।

काली मिर्च : 10 पिसी हुई काली मिर्च फांककर ऊपर से गर्म पानी में नींबू निचोड़कर सुबह-शाम पीते रहने से गैस बनना बंद हो जाती है। 6 काली मिर्च और 3 लौंग पीसकर स्वादानुसार नमक मिलाकर एक कप पानी में उबालकर पीएं। यह भी बहुत फायदेमंद है।

सरसों का तेल : नाभि के स्थान से हटने से, सही काम न करने से प्रायः पेट गैस, दर्द, भूख न लगना इत्यादि होते हैं। इनको दूर करने के लिए नाभि को सही बैठाना चाहिए। नाभि पर सरसों की तेल लगाने से लाभ होता है। रोग की तीव्रता होने पर रूई का फाया सरसों के तेल में भिगोकर नाभि पर रखें और पट्टी से बांधें।

अदरक : 6 ग्राम अदरक बारीक काटकर थोड़ा सा नमक दिन में एक बार लगाकर 10 दिनों तक भोजन से पहले खाएं। इससे पेट की गैस दूर होगी। दूध : दूध उबालते समय उसमें एक पीपल डालकर पीएं।

पुदीना : प्रातः काल एक गिलास पानी में 25 ग्राम पुदीने का रस, 30 ग्राम शहद लाकर पीने से गैस की बीमारी में विशेष लाभ होता है।
बैंगन : ताजा लम्बे बैंगन की सब्जी, जब तक मौसम में बैंगन रहें, खाते रहें। इससे गैस की बीमारी दूर होगी।

अजवायन : 6 ग्राम पिसी हुई अजवायन में डेढ़ ग्राम काला नमक मिलाकर भोजन के बाद गर्म पानी के साथ फांक लें। इससे अफारा मिटता है, पेट की गैस बाहर निकलती है। भोजन में किसी भी रूप में अजवायन लेते रहें।

हींग : हींग को गर्म पानी में घोलकर नाभि से आसपास लेप करें। एक ग्राम हींग भूनकर किसी भी चीज के साथ खाने से भी लाभ होता है। यदि पेट दर्द गैस की वजह से हो तो दो ग्राम हींग आधा किलो पानी में उबाल लें। चौथाई पानी रह जाने पर गर्म-गर्म पीएं।

लौंग : पांच लौंग पीसकर उबलते हुए पानी में डालें, फिर कुछ ठंडा होने पर पीएं। इस प्रकार तीन बार हर रोज करें।

श्वांस : भोजन के बाद सीधे लेटकर आठ लम्बे श्वांस लें। दाहिनी करवट लेकर सोलह और अंत में बायीं करवट लेकर बत्तीस श्वांस लें। ऐसा करने से भोजन यथास्थान पहुंच जायेगा और गैस मुंह से डकार के रूप में या गुदा से अपान वायु के रूप में उसी समय निकल जाती है।

इस नुस्खे को नित्य नियम से करते रहने से आप गैस की बीमारी से बचे रहेंगे। धनिया : दो चम्मच सूखा धनिया एक गिलास पानी में उबलाकर छानकर उस पानी को तीन बार बराबर मात्र में पीएं।
करेला : गैस ठीक करने के लिए करेले की सब्जी खाएं। करेले का रस भी बहुत लाभदायक है।

अमरूद : अमरूद के सेवन से गैस दूर होती है। अमरूद काटकर सैंधा नमक लगाकर सुबह-शाम खाने से पाचन शक्ति भी बढ़ती है।
गुड़ : खाना खाने के बाद गुड़ खाने से उदर वायु ठीक होती है।

मूली : भोजन के साथ मूली पर नमक व काली मिर्च डालकर दो माह तक नित्य खाएं। ऐसा करने से उदर वायु, गैस, अफारा नहीं बनता।

वज्र आसन : भोजन के बाद बीस मिनट तक वज्र आसन पर बैठे। अपान मुद्रा : रोजाना 30 मिनट तक अपान मुद्रा में बैठें। गैस की बीमारी से निजात मिलेगी।

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